Saturday, December 15, 2007

Dark Silence

I have always been an ardent fan of Harivansh Rai Bachchan's poetry. But it wasn't till I read this composition of his, that I awoke to the power of his words...

रात आधी खींच कर मेरी हथेली

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने

फासला था कुछ हमारें बिस्तरों में
और चारों ऑर दुनिया सो रहीं थी
तारिकायें ही गगन की जानती थी
जो दशा दिल की तुम्हारें हो रहीं थी
मैं तुम्हारें पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने

एक बिजली छू गयी सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में
इस तरह करवट पडी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन मे
मैं लगा दूं आग उस संसार में
हैं प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर
जानती हो उस समय क्या कर गुजरने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने

प्रात ही की ऑर को हैं रात चलती
उजाले में अँधेरा डूब जाता
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने
पर गज़ब का था किया अधिकार तुमने
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने

और उतने फासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी आए फिर कभी हम
फिर आया वक़्त वैसा
फिर मौका उस तरह का
फिर लौटा चाँद निर्मम
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ!
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने

~ हरिवंश राय बच्चन

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2 Comments:

Blogger Sushrut said...

Nice :)

3:37 AM  
Blogger Sangram said...

thoda over dose jhala ...! don tin veLa vachavi lagali ...

bachchans rock [:)] koi likh ke express karate hai ... koi bolake ... to koi act karake [:)]

10:40 PM  

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